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प्रवीण शुक्ल ने अपनी काव्य-प्रतिभा का जो स्वरूप प्रस्तुत किया है, उसे देखने के बाद मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता हूँ कि उनके पास नया सोच, नया कथ्य, नया बिम्ब सभी कुछ अनूठा है। यह युवा कवि आगे चलकर साहित्य-जगत को कोई ऐसी कृति अवश्य देगा जिससे वह स्वयं तो बड़ा कवि माना ही जायेगा, साथ ही उसकी इस कृति से साहित्य-जगत भी गौरवान्वित होगा।
पदमश्री गोपालदास नीरज
(तुम्हारी आँख के आँसू, गीत-संग्रह की भूमिका में)



प्रवीण शुक्ल की कविताएँ पढ़कर लगता है कि प्रवीण शुक्ल ने इन कविताओं को लिखा भी है और जिया भी है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने अपनी हास्य-व्यंग्य रचनाओं में हास्य को उपहास तक नहीं पहुँचने दिया है। उसकी कविताओं में जिसके प्रति कटाक्ष किया गया है उसे लेकर हास्य की भावना तो है लेकिन उसे चोट पहुँचाने की दुर्भावना नहीं है। इन कविताओं की एक और ख़ास बात है ये कविताएँ हमारे पूर्व प्रतिष्ठित हास्य रस के कवियों की हास्य कविताओं जैसी नहीं हैं। इसमें प्रवीण शुक्ल ने नवीन प्रयोग किए हैं। इन कविताओं में हास्य कविता के प्रारम्भ होने से लेकर समाप्त होने तब विषय की माँग के अनुसार स्वयं उत्पन्न हो गया है। इसलिए ये कविताएँ सहज प्रवाहमान हास्य की कविताएँ बनी हैं। हास्य आया हुआ लगता है डाला हुआ नहीं लगता। सुरेन्द्र शर्मा
(हँसते-हँसाते रहो, हास्य-व्यंग्य संग्रह की भूमिका में)



प्रवीण शुक्ल का भाषा पर अधिकार है जिसमें सरसता है। समाज की स्थितियों पर एक जागरूक नजर है जिसमें समरसता है। हर प्राणी उनकी जानकारी में है जिसकी हालत खस्ता है। प्रवीण के कंधो पर ज़िन्दगी की अपाठय पुस्तकों का एक भारी सा बस्ता है। भारतवासियों के सिर पर परेशानियों का जितना भार लदा है, प्रवीण उसे बड़ी कुशलता से उतारना चाहते हैं, ये उनकी लेखनी की सीधी और सधी लेकिन बंकिम अदा है।
ड़ॉ अशोक चक्रधर
(कहाँ वे कहाँ ये, हास्य-व्यंग्य संग्रह की भूमिका में)




इन दिनों अपनी काव्य-धर्मिता और निरंतर रचना-प्रक्रिया की वजह से प्रवीण शुक्ल ने जो खयाति प्राप्त की है वह कुछ रचनाकारों के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकती है किन्तु मेरे लिए अनिवर्चनीय आल्हाद का विषय है। प्रवीण शुक्ल ने अपनी कविताओं में छन्दों और शब्दों को माँझा है। उनकी खोजपूर्ण दृष्टि काव्य के हर अंग पर पड़ी है। कविता के हर मोड पर वह अपनी मौलिकता का दीपक जलाये हुए खडे हैं। मुझे लगता है कि उनकी कविता माँ वाणी के सम्मुख एक विनत रचनाकार की प्रार्थना है, अर्चना है।
संतोषानन्द
(तुम्हारी आँख के आँसू, गीत-संग्रह की भूमिका में)




प्रवीण शुक्ल के हास्य में हास्य मात्रा हँसाने के लिए नहीं है अपितु साभिप्राय: है। उसमें विरक्त आकाश का प्रकाश, शुक्ल पक्ष की चाँदनी सी शीतलता और धावलता है। व्यंग्य में प्रवीणता है, प्रगल्भता है, कसमसाहट है क्षोभ या क्रोध नहीं। व्यंग्य को सीमा में रखकर सफलता से सम्प्रेषित करना कठिन कार्य है जिसे प्रवीण शुक्ल ने बखूबी किया है।
ओमप्रकाश आदित्य
(कहाँ वे कहाँ ये, हास्य-व्यंग्य संग्रह की भूमिका में)




प्रवीण शुक्ल की ग़ज़ल आज की ग़ज़ल की बहतरीन मिसाल है और वो आज की शायरी ज़बान में ग़ज़ल की तमाम खूबियों के साथ पैकर तराशी करती है। प्रवीण शुक्ल के शे'र पूरे उतरते हैं। मुझे उनकी शायरी और उनकी शख्सियत दिल से पसंद है और आप देखेंगे की अगर वो इसी खुलूस के साथ अपने आपको तराशते रहे तो वो यकीनन आज की ग़ज़ल के बड़े शायर होंगे।
बशीर बद्र
(आइना अच्छा लगा, ग़ज़ल-संग्रह की भूमिका में)



आज की ग़ज़ल अपने युग की धूप-छाँव का आइना है। प्रवीण शुक्ल ने अपनी ग़ज़ल को अपने सफर का हमसफर बनाया है। वह अपने जमाने को अभिव्यक्त करने के लिए ग़ज़ल के फार्म को अपनाए हुए हैं उनकी उम्र की तरह उनकी ग़ज़ल चौंचाल भी है, कहीं ग़म से निढ़ाल भी है और कहीं खुशी में खुशहाल भी है। मैं उनकी इस सुन्दर रचनात्मकता के लिये बधाई देता हूँ। उनकी क़लम में नये मौसमों की ताज़गी वाकई
काबिले तारीफ है।
निदा फाज़ली
(आइना अच्छा लगा, ग़ज़ल-संग्रह की भूमिका में)



प्रवीण शुक्ल के व्यक्तित्व की निश्छलता और धारदार सारगर्भित लेखन ने मुझे भीतर तक आंदोलित किया है। प्रवीण शुक्ल हास्य-व्यंग्य के तो कुशल चितेरे हैं ही साथ ही साथ छंद पर भी उनका पूरा अधिकार है। इसलिए उन्होंने अपनी काव्यकला और धारदार लेखन से देश के करोड़ों श्रोताओं के मन-मस्तिष्क पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है। उनकी कविताएँ पढ़ने के बाद स्पष्ट हो जाता है कि वे हास्य-व्यंग्य के श्रेष्ठ, प्रबुध्द और अप्रतिम कवि हैं। अर्से बाद हास्य-व्यंग्य के खुले झरोखे से हवा का ताज़ा और ख़ुशबूदार झोंका आया है।
माणिक वर्मा
(हँसते-हँसाते रहो, हास्य-व्यंग्य संग्रह की भूमिका में)



आजकल नयी पीढ़ी के अनेक कवियों की कविताएँ सुनने के बाद एक कष्ट तो यह होता है कि वह धीरे-धीरे छन्द से विमुख होते जा रहे हैं। जहाँ पुराने अधिकांश हास्य-व्यंग्य कवि अपनी रचनाओं को छन्द की कसौटी पर कसने के बाद जनता के सम्मुख प्रस्तुत करते थे वहीं आजकल अनेक कवि अपनी तुकबन्दी को ही कविता समझ बैठे हैं। ऐसी स्थितियों के बीच प्रवीण शुक्ल की कविताएँ अंधेरे में रोशनी की भाँति दिखाई देती हैं। कविता जैसे कठिन वार्णिक छन्द पर मेरे मार्गदर्शन में जितनी निपुणता के साथ प्रवीण ने अपनी पकड़ मज़बूत की है उसका दूसरा उदाहरण दुर्लभ है। अतुकान्त कविताओं में भी अपने विषय का चयन प्रवीण शुक्ल बहुत सर्तकता के साथ करते हैं। वे अपनी कविताओं के माध्यम से केवल समस्याओं का वर्णन ही नहीं करते वरन् उन्हें समाधान के बिन्दु पर ले जाकर छोड़ते हैं
अल्हड़ बीकानेरी
(हँसते-हँसाते रहो, हास्य-व्यंग्य संग्रह की भूमिका में)



हिन्दी काव्य-मंचों पर अपनी हास्य-व्यंग्य की कविताओं, संचालन, अनेक गंभीर रचनाओं और अपने मधुर व्यवहार के लिए प्रसिध्द प्रवीण शुक्ल का नाम अब अनजाना नहीं है। प्रवीण ने अपने देश के कोने-कोने में तो अपनी काव्य-प्रतिभा का चमत्कार दिखाया ही है साथ ही विदेशो में भी अपना नाम रौशन किया है। इतनी कम उम्र में यह कमाल ढाने वाले कुछ ही लोग हैं। आज के प्रसिध्द, वरिष्ठ और जागरूक व्यंग्य कवि तथा विविध आयामी प्रतिभा के धनी डॉ अशोक चक्रधार सरीखे कुछ ही कवि हैं जिन्होंने इतनी कम उम्र में यह करिश्मा कर दिखाया था। प्रवीण शुक्ल के सामने अभी व्यापक आकाश है। अभी इन्हें दूर के क्षितिज छूने हैं। अभी भविष्य के गर्भ में बहुत कुछ ऐसा है जिसे प्रवीण एक-न-एक दिन साहित्य-जगत को सौंपकर स्वयं को गौरवान्वित करेंगे।
ड़ॉ. कुँअर बेचैन
(हँसते-हँसाते रहो, हास्य-व्यंग्य संग्रह की भूमिका में)



मेरा यह स्पष्ट मानना है कि सच्चा हास्य कवि संवेदना और भावुकता को जिए बिना हो ही नहीं सकता है। ऑंसू ही हमारी मुस्कानों की ज़मीन होते है। वेदना ही हमारे सुख को आकाश तक ले जाने में सहायक होती है। सच्चा कवि भले ही हास्य, वीर, श्रन्गार क़ुछ भी लिखे, संवेदना से उसका रिश्ता टूट ही नहीं सकता। यही बात कमोबेश प्रवीण शुक्ल के बारे में भी कही जा सकती है। मंच पर खड़े होकर जिसने लाखों की भीड़ को हँसाया है, वह भीतर से कितना भावुक है, इसे इने-गिने लोगों के अलावा शायद ही कोई जानता हो। उनकी कविताओं में शान्त, वीर, रौद्र और भक्ति रस के अनेक उदाहरण मिल जायेंगे। उपमा और रूपकाभास अलंकारों के माधयम से कवि ने अपनी अभिव्यक्ति विषयानुकूल और प्रभावी बनाई है।
ड़ॉ. उर्मिलेश
(तुम्हारी ऑंख के ऑंसू, गीत-संग्रह की भूमिका में)



प्रवीण शुक्ल की कविताओं को मैंने कभी अश्लील होते नहीं देखा। साम्प्रदायिकता का प्रभाव भी उनकी कविताओं पर नहीं है। अपने समय की इन दो भयानक बुराइयों से बचे रहना यह बताता है कि इन कविताओं को एक सजग कवि ने रचा है। इस कवि ने देखते-ही-देखते देश-विदेश के काव्य-मंचों पर अपनी एक अलग पहचान बना ली है। यह देखकर हर्ष होता है कि साफ-सुथरे हास्य की परम्परा में एक और ताजा स्वर शामिल हो गया है।
अरुण जैमिनी
(कहाँ वे कहाँ ये, हास्य-व्यंग्य संग्रह की भूमिका में)