Kaavyansh

  सम्बन्ध
तुम धरती, मैं नीलगगन हूँ
तुम खुशबू हो, मैं चंदन हूँ
सूखे ने भोली बदली को
अपने मन की व्यथा सुनाई
सतरंगे आँचल में लिपटी
बदली घुमड़-घुमड मँडराई
बोला सूखा-बिना तुम्हारे
आज कलेजा फट जायेगा
लेकिन तुम निश्चित बरसोगी
बुरा वक़्त यह कट जायेगा
तुम दूरी, मैं आकर्षण हूँ
तुम धरती, मैं नीलगगन हूँ
वृक्ष खड़ा जो अपने बल पर
बार-बार जड से ये कहता
तुम मुझको संबल देती तो
आँधी-तूफानों को सहता
सींचोगी जो नेह नीर से
तो हम दोनों और जुड़ेंगे
सम्बन्धों से सदा हमारे
नये-नये अँकुर उपजेंगे
तुम दिल, मैं दिल की धड़कन हूँ
तुम धरती, मैं नीलगगन हूँ
  आदम-हव्वा मिलकर दोनों
आपस में अक्सर बतियाते
जीवन में क्या-क्या करना है
वे सतरंगी स्वप्न सजाते
नेह मिलाकर जब माटी में
रखेंगे हम नींव दुबारा
शीशमहल से सुन्दर होगा
तब सपनों का महल हमारा
तुम घर, मैं घर का आँगन हूँ
तुम धरती, मैं नीलगगन हूँ
सूरज के ढलने पर जैसे
ढल जाती है उसकी लाली
पतझर के आने पर जैसे
झर जाती है डाली-डाली
साथ तुम्हारे मैं बसन्त की
हरियाली से भर जाऊँगा
बिना तुम्हारे पात-पात हो
पतझर जैसा झर जाऊँगा
तुम बदली हो, मैं सावन हूँ
तुम धरती, मैं नीलगगन हूँ